महान भारतीय गणितज्ञ रामानुजन


प्रसिद्ध फेंच गणितज्ञ लापलेस ने जब अपना ग्रन्थ 'ब्रह्माण्ड-गतिविज्ञान'। नेपोलियन को भेंट किया, तो नेपोलियन ने उससे पूछा, "कितने आश्चर्य की बात है कि आपने ब्रह्माण्ड पर इतना बड़ा ग्रन्थ लिखा और 'ब्रह्माण्ड निर्माता' का उसमें एक बार भी उल्लेख नहीं है ?" लापलेस ने सीधा-सादा उत्तर दिया, 'मान्यवर, मेरे ग्रन्थ में प्रतिपादित सिद्धान्तों के लिए उस 'परिकल्पना' की आवश्यकता नहीं है।"

परन्तु रामानुजन् के लिए बात दूसरी ही थी। किसी महान ईश्वरीय सत्ता की बात तो दूर रही, रामानुजन् ग्राम-देवी-देवताओं में भी विश्वास करते थे। लेकिन यह मात्र विश्वास ही नहीं था। वह कहा करते थे कि नामगिरि नामक एक ग्राम-देवी उनके स्वप्नों में आकर गणित के फार्मूले निकालने में उनकी सहायता करती है। जहाँ तक मेरा विश्वास है, रामानुजन् यह कभी भी स्पष्ट न कर सके कि देवी की यह ‘सहायता' किस रूप की थी, किस माध्यम से थी।

मनोविश्लेषण के क्षेत्र में मैं नहीं उतरना चाहता, किन्तु रामानुजन को देवीजी की यह मदद मेरे लिए एक पहेली ही है और सम्भवतः बनी ही रहेगी। समस्या उन तरुण गणितज्ञों के लिए है जो विज्ञान के क्षेत्र में देवी-देवताओं को घुसने नहीं देना चाहते। कितना अच्छा होता यदि ये असंख्य देवी-देवता उनकी भी सहायता करते जिनका कि उनमें विश्वास नहीं है। मेरे विचार से वे यह भी अनुकम्पा करते हैं, वरना सब प्रगति ही रुक जाती।

रामानुजन के अपने जो भी विश्वास रहे हों, निस्सन्देह वह एक महान गणितज्ञ थे। बीसवीं शताब्दी के गणितज्ञों में, न केवल भारत के अपितु संसार के महान गणितज्ञों में, उनका प्रमुख स्थान है। जिस कठिनाई से और अल्पायु में रामानुजन् ने गणितशास्त्र की सेवा की है, वह हमारे लिए एक आदर्श है। यहाँ पर उनके गणितीय सिद्धान्तों की विस्तार से चर्चा करना सम्भव न होगा, क्योंकि वह 'गणितज्ञों के भी गणितज्ञ' हैं।

श्रीनिवास रामानुजन् आयंगर का जन्म 22 दिसम्बर, 1887 को एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता कुम्भकोनम् (तंजौर जिला, मद्रास) के एक कपड़े के व्यापारी की दुकान पर साधारण मुनीम थे। विवाह के बाद बहुत दिनों तक जब उन्हें कोई सन्तान नहीं हुई तो रामानुजन के नाना ने नामगिरि नामक एक ग्राम-देवी की मनौती मानी। कुछ दिनों बाद रामानुजन् का जन्म हुआ।

रामानुजन् की आरम्भिक शिक्षा कुम्भकोनम् के हाई स्कूल में हुई। प्राइमरी कक्षाओं में हमेशा प्रथम आते रहे। वह स्वभाव से शान्त थे और उनकी स्मरण शक्ति गजब की थी। वह गणित की पहेलियों से अपने साथियों का मनोरंजन किया करते थे। उन दिनों गणित की पुस्तकें प्राप्त करने में काफी कठिनाई होती थी। रामानुजन् जब हाई स्कूल में ही पढ़ रहे थे, तो उनके एक हितैषी ने उनके लिए कार महाशय की 'सिनॉप्सिस ऑफ प्योर मैथेमैटिक्स' नामक पुस्तक ला दी। तब क्या था ! रामानुजन् रात-दिन भूल गये । इस पुस्तक द्वारा पहले तो उन्हाने अंकगणित के कुछ फार्मूले खोज निकाले, फिर ज्यामिति की ओर बढ़े। इसी समय उन्होंने स्वतन्त्र रूप से पृथ्वी के विषुवत वृत्त की लम्बाई ठीक-ठीक ज्ञात की। फिर वह बीजगणित की ओर बढ़े। क्योंकि रामानुजन् के पास उच्चगणित की यही एकमात्र पुस्तक थी, अतः उनके द्वारा शोधित फार्मूलों में कुछ ऐसे भी थे जो कि गणितज्ञों को पहले से ही ज्ञात थे। किन्तु इससे रामानुजन् की स्वतन्त्र सोज का महत्व किसी भी रूप में कम नहीं होता।

सन् 1903 में, 16 वर्ष की आयु में रामानुजन् ने मैट्रिक की परीक्षा पास की। उन्हें छात्रवृत्ति भी मिलने लगी। अन्य विषयों में वह कमजोर थे, क्योंकि वह अपना सभी समय गणित में ही लगाते थे। इसलिए रामानुजन इण्टर की परीक्षा में फेल हो गये परिणामस्वरूप छात्रवृत्ति से हाथ धोना पड़ा। घर की स्थिति तो पहले से ही खराब थी, अत: वह मद्रास चले गये। सन् 1907 में वह फिर परीक्षा में बैठे, परन्तु फिर फेल हो गये। इसके बाद वह फिर कभी परीक्षा में नहीं बैठे। स्वतन्त्र रूप से गणित का अध्ययन करते रहे।

सन् 1909 में रामानुजन् का विवाह हो गया। अब उनके लिए नौकरी करना आवश्यक हो गया। नौकरी की खोज के सिलसिले में रामानुजन् का दीवान बहादुर रामचन्द्र राव से परिचय हआ। रामचन्द्र राव नेलोर के कलेक्टर थे और गणित के बेहद प्रेमी थे। रामानुजन से अपनी प्रथम भेंट का उन्होंने निम्नलिखित शब्दों में वर्णन किया है- "कुछ वर्ष पहले मेरा भतीजा, जिसे गणित का कुछ भी ज्ञान नहीं है, मेरे पास आया और कहने लगा, मैं एक ऐने आदमी को जानता है, जो हमेशा गणित की ही चर्चा करता है। मेरी तो कुछ भी समझ में नहीं आता।' अपने गणित-प्रेम के कारण मैने रामानुजन् को उपस्थित होने की अनुमति दे दी। एक छोटे कद की पतली-सी, कुछ गन्दी-सी, परन्तु आँखों में चमक लिये और बगल में एक नोटबुक थमाये, एक मूति मेरे सामने हाजिर हुई। स्पष्ट था कि उसकी हालत बहुत ही दयनीय थी। अपना गणित का अध्ययन चालू । रखने के उद्देश्य से वह कुम्भकोनम् से मद्रास चला आया था। उसकी कोई अधिक इच्छा-अभिलाषाएँ नहीं थीं। बस, वह इतनी ही सुविधा चाहता था कि उसे खाने-भर को मिल जाये, ताकि बिना किसी बाधा के वह अपने सपनों में रम सके।

"उसने अपनी नोटबुक खोली और मुझे उसमें से कुछ फार्मूले समझाने लगा। मैं तत्काल समझ गया कि इनमें कुछ खास बात है, परन्तु गणित के मेरे अल्पज्ञान के कारण रामानुजन् के फार्म ले मेरी समझ से बाहर थे। बिना कुछ निर्णय किये, मैने उसे फिर आने को कहा और वह आया भी। किन्तु इस बार उसने मेरे सामने कुछ आसान काम ले रखे, क्योंकि वह मेरे गणित-सम्बन्धी अल्पज्ञान को भाप गया था। धीरे-धीरे उसने मुझे अपने कठिन फार्मले भी समझाये। अन्त में उसने कहा कि गणित का अध्ययन चाल रखने के लिए वह केवल थोड़ी निश्चिन्तता चाहता है।"

कुछ समय के लिए रामचन्द्र राव ने रामानुजन का खर्च स्वयं अपने कार ले लिया। डायवति प्राप्त करना चाठिन हो गया। किन्तु रामानुजन् किसी पर बोझ बने रहना नहीं चाहते थे। अन्त में उन्होंने मद्रास पोर्ट ट्रस्ट के ऑफिस में 30 रुपये मासिक की नौकरी स्वीकार कर ली। परन्तु रामानुजन् के गणित के अध्ययन में किसी तरह की कमी नहीं आयी। सन् 1911 में उनका प्रथम लेख मैथेमेटिकल सोसाइटी के मुखपत्र
में प्रकाशित हुआ। इस समय रामानुजन 23 वर्ष के थे। अगले वर्ष उन्होंने इनी पत्र में दो लेख और उपवाये। रामचन्द्र राव के प्रभाव से मद्रास इंजीनियरिंग पलिज के विविध महाशय और मद्रास पोर्ट ट्रस्ट के चेयरमैन सर फासिम स्प्रिंग ने रामानजन की बड़ी सहायता की। उस समय इंग्लैण्ड के उदीयमान गणितज्ञों में डॉ. हाकी काफी चर्चा थी। हितषियों की सलाह से रामानुजन् ने सहारी में पत्र-व्यवहार शुरू किया। 16 जनवरी,1913 को हार्टी के नाम निगरमा उनका प्रथम पत्र इस प्रकार था-

"मान्यवर,
मैं मद्रास पोर्ट-स्ट ऑफिस में एक साधारण-मा क्लर्क हूँ। विश्वविद्यालय की उच्च पहाई में हासिल नहीं कर सका, किन्तु स्कूल की मामान्य पढ़ाई कर चुका है। स्कूल छोड़ने के बाद से अपना खाली समय में गणित को ही देता आया है। विश्वविद्यालय में पड़ाये जानेवाले गणित से यद्यपि मैं परिचित नहीं है, फिर भी मैंने स्वतन्त्र रूप से गणितशास्त्र में कुछ सिद्धान्त खोज निकाले हैं। अपसारी श्रेणी (डाइवरजेण्ट सीरीज) से सम्बन्धित मैने कुछ नये सिद्धान्त खोज निकाले हैं। स्थानीय गणितज्ञों का मत है कि मेरे शोध अद्भुत' हैं।

इस पत्र के साथ मैं अपने अनुसन्धान भेज रहा हूँ। आपसे मेरा सविनय अनुरोध है कि आप मेरे लेखों को देखें । मैं एक गरीब भारतीय हूँ । मेरे लेखों में यदि कुछ भी नूतनता है तो आप इनके प्रकाशन में अवश्य सहयता करेंगे । आप उस विषय के ज्ञाता हैं ।आपकी प्रेरणा से मुझे उत्साह मिलेगा । कष्ट के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ ।
                                                   विनीत
                                                  रामानुजन "

इस पत्र के साथ रामानुजन ने डॉ . हार्डी को अपने 120 प्रमेय भेजे थे । इनमे से कुछ ऐसे थे जो गणितज्ञों को पहले से ही ज्ञात थे । लेकिन इनमे से कुछ ऐसे भी प्रमेय थे , जो एक असाधारण गणितज्ञ के ही बुद्धि की उपज हो सकते थे । डॉ. हार्डी ने इन प्रमेयों को देखकर बड़े प्रभावित हुए और उन्होनें इनके प्रकाशन की भी व्यवस्था कर दी ।

अन्त में मई 1913 में मित्रों की सहायता से रामानुजन को एक विशेष छात्रवृत्ति मिली और साथ ही मद्रास पोर्ट-ट्रस्ट से मुक्ति भी । उधर हार्डी महाशय रामानुजन को इंग्लैण्ड बुलाने का प्रयत्न करने लगे । परन्तु जाति वालों ने विदेश जाने में बाधाएँ डाल दी । अन्त में एक अजीब ढंग से उन्हें विदेश जाने की अनुमति मिल ही गयी। एक दिन प्रात:काल उनकी माताजी ने कहा कि उन्होंने रात को सपना देखा है, जिसमें उन्होंने देखा कि उनका बेटा एक बहुत बड़े हॉल में गोरे लोगों के बीच बैठा है और नामगिरि देवी ने भी आज्ञा दी है कि बेटे की विदेश-यात्रा में बाधक न बनो। इसी बीच मद्रास विश्वविद्यालय ने रामानुजन् को विदेश जाने के लिए 250 पौण्ड सालाना छात्रवृत्ति देना स्वीकार कर लिया। माँ की अनुमति पाकर और अपनी छात्रवृत्ति में से उसके लिए कुछ व्यवस्था करके 17 मार्च, 1914 को रामानुजन् इंग्लैण्ड के लिए रवाना हो गये।

रामानुजन् इंग्लैण्ड पहुँच गये, किन्तु डॉ. हार्डी के सामने एक नयी समस्या आ खड़ी हुई। इस व्यक्ति का कैसे मार्गदर्शन करें? गणितशास्त्र के कुछ ऐसे उपांग थे जिन पर रामानुजन् का पूर्ण अधिकार था, किन्तु कुछ ऐसी प्रारम्भिक बातें भी थीं जिनके बारे में उनका ज्ञान नहीं के बराबर ही था। रामानुजन् जैसी प्रतिभा को शुरू से गणित पढ़ाना व्यर्थ था। अतः उनके मार्गदर्शन की जिम्मेदारी हार्डी ने स्वयं अपने ऊपर ले ली। फिर भी डॉ. हार्डी ने अन्त में स्वीकार किया था-"रामानुजन् को मैंने जितना कुछ पढ़ाया उससे कहीं अधिक मैंने उससे सीखा।"

इंग्लैण्ड में रहते हुए भी रामानुजन् खान-पान और व्यवहार से भारतीय ही बने रहे। स्वयं अपने हाथ से भोजन बनाते थे-शाकाहारी भोजन मानसिक परिधम इतना अधिक करते थे कि अन्त में स्वास्थ्य पर असर पाना स्वाभाविक था। सन् 1917 में तपेदिक के चिन्ह दिखायी देने लगे। उन्हें केम्ब्रिज के अस्पताल में भर्ती किया गया। इधर उनके लेख उच्च कोटि की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने के कारण उनकी प्रतिष्ठा काफी बढ़ चुकी थी। अन्त में इंग्लैण्ड की प्रसिद्ध 'रॉयल सोसाइटी' ने 28 फरवरी, 1918 को रामानुजन् को अपना फैलो बना लिया। इससे उनको और भी उत्साह मिला और स्वास्थ्य का विना खयाल रखे वह जोर-शोर से गवेषणा-कार्य में जुट गये।

प्रथम महायुद्ध की समाप्ति के वाट सन् 1919 में रामानुजन् स्वदेश लौट आये । स्वास्थ्य-लाभ के लिए उन्हें कावेरी तट पर स्थित कोदमण्डी ग्राम में रखा गया, परन्तु स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हआ। अन्त में 26 अप्रैल, 1920 को केवल 33 वर्ष की अल्पायु में, इस महान् गणितज्ञ ने प्राण त्याग दिये।

रामानुजन् एक विशुद्ध गणितज्ञ थे। उनके सभी शोध संख्याशास्त्र से ही सम्बन्धित हैं। जिस प्रकार स्वयं गणित का सभी विज्ञानों में प्रमुख स्थान है, उसी प्रकार संख्याशास्त्र का गणितशास्त्र में प्रमुख स्थान है। वैसे तो सभ्यता के प्रारम्भ से ही मनुष्य प्राकृतिक संख्याओं से गिनती करता आया है, परन्तु गणितज्ञों का आरम्भ से यही प्रयत्न रहा है कि 1, 2, 3, 4, 5 जैसी संख्याओं से सम्बन्धित ऐसे नियमों का पता चले जो एक-दो नहीं, सभी संख्याओं पर समान रूप से लागू हो सकें।

संख्याशास्त्र में हम केवल एक-दो संख्याओं से ही सम्बन्धित नहीं होते (जैसे 6 को 2 द्वारा ठीक-ठीक भागा जा सकता है), परन्तु सम्पूर्ण संख्याओं पर एक साथ विचार करते हैं (जैसे सभी समसंख्याओं को 2 द्वारा ठीक-ठीक भागा जा सकता है) । सम्भवत: ये निर्णय आपको बड़े आसान लगते होंगे, किन्तु जब इनको सिद्ध करने का सवाल उठता है तो गणितज्ञों को बहुत ही गहराई में उतरना पड़ता है।उदाहरणस्वरूप, हम गोल्डबाख द्वारा प्रतिपादित अनुमान को ले सकते हैं: 2 से बड़ी हर सम-संख्या दो अखण्ड संख्याओं का योग होती है, इस प्रकार 4 दो अखण्ड संख्याएँ 2 और 2 का योग है, 6 दो अखण्ड संख्याएं 3 और 3 का योग है, 8 दो अखण्ड संख्याएँ 3 और 5 का योग है, और इसी प्रकार यह क्रम चलता रहेगा। लेकिन इसी तरह के अनेक लिखित उदाहरण देने से यह सिद्ध नहीं होता है कि सभी समसंख्याएँ दो अखण्ड संख्याओं का योग हैं। यद्यपि अभी तक ऐसा एक भी उदाहरण नहीं मिला है जिससे कि 'गोल्डबाख का अनुमान' गलत साबित हो सके।

संख्याशास्त्र का एक और प्रश्न, जिसको सुलझाने में रामानुजन् का योग रहा, पूर्ण संख्या के विभाजन से सम्बन्धित है। कोई भी पूर्ण संख्या ले लीजिए, जैसे कि 33; इसे हम तीन विभिन्न रूपों में लिख सकते हैं-3+0, 1+2, 1+1+1। आप आसानी से जान सकते हैं कि इस संख्या को अन्य किसी विभाजन में आप प्रकट नहीं कर सकते। इसी प्रकार 4 को आप 5 विभिन्न रूपों में प्रकट कर सकते हैं-4+0 , 3+1, 2+2 , 2+1+1 , 1+1+1+1 । इसके अतिरिक्त कोई अन्य रूप नहीं हो सकता। लेकिन यह तो छोटी संख्याओं की बात हई। 3 की बजाय 7,80,00,000 जैसी विशाल संख्या हो तो आप क्या करेंगे? हमें कोई ऐसा सर्वमान्य फार्मूला खोज ही निकालना पड़ेगा जो छोटी-बड़ी सभी संख्याओं के विभिन्न विभाजनों को प्रकट कर सके। सन् 1917 में रामानुजन् ने इसी तरह का एक फार्मला खोज निकाला।।

रामानुजन् वास्तव में उस गणित-वर्ग के सदस्य थे जो कि गणितशास्त्र को एक खेल मात्र मानकर चलते हैं। जिस प्रकार किसी खेल के अपने कुछ नियम होते हैं, उसी प्रकार गणित में भी 1, 3,+,-, = जैसे चिह्नों को लेकर विधिवत् एक प्रकार का खेल ही खेला जाता है। इस गणित की उपयोगिता से उन्हें कोई मतलब नहीं होता।

रामानुजन् की गणितीय गवेषणाओं की चर्चा करते हुए डॉ. हार्डी ने लिखा है, "मुझसे लोगों ने कई बार पूछा है कि क्या रामानुजन् के पास कोई जादू था ? क्या दूसरे गणितज्ञों से उनके तरीके कुछ भिन्न थे ? क्या उनकी चिन्तन-प्रणाली दूसरों से भिन्न थी? इन सब प्रश्नों का मेरे पास कोई ठीक-ठीक जवाब नहीं है । मेरा तो विश्वास है कि गहराई में उतरकर सभी गणितज्ञ एक ही तरह से सोचते हैं और रामानुजन् इसका अपवाद नहीं थे। अंकों के साथ वह एक कुशल खिलाड़ी की तरह खेलते थे।" मुझे स्मरण है डॉ. लिटिलवुड ने एक बार कहा था--"प्रत्येक अंक के साथ उस (रामानुजन्) की गहरी दोस्ती है।" एक बार की घटना है। रामानुजन् उस समय अस्पताल में थे और मैं उन्हें देखने गया था। टैक्सी का नम्बर था-1729 । रामानुजन् से मिलने पर मैंने यों कह दिया कि यह तो एक अशुभ संख्या है, (इस संख्या में एक गुणनखण्ड 13 है, और परम्परा से यह संख्या अशुभ मानी जाती रही है। किन्तु रामानुजन् ने झट उत्तर दिया- 'नहीं, यह तो एक अद्भुत संख्या है। यह एक ऐसी सबसे छोटी संख्या है, जिसे हम दो धन-संख्याओं के योग द्वारा दो विभिन्न रूपों में प्रकट कर सकते हैं। जैसे :

1729 =7×13×19
          =12³+1³
          =10³+9³

सन् 1926 में रामानुजन् के निबन्धों का संकलन केम्ब्रिज विश्वविद्यालय प्रेस ने डॉ. हार्डी से सम्पादित करवाया। डॉ. हार्डी ने जीवन परिचय में एक जगह पर लिखा है :

"रामानुजन् का जीवन विचित्रताओं और विरोधों मे भरा जान पड़ता है। एक-दूसरे की बूझ की रीतियाँ उनके सम्बन्ध में असफल रहती हैं ।उनके विषय में इसी एक बात में हम एकमत रखते हैं कि वह एक महान गणितज्ञ थे।"

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